गुब्बारे

गरमी की दोपहरी में सिग्नल पर लाल लाईट होते हो कारों की लम्बी लाईन लग गयी , वहाँ एक लड़की हाथ रंगबिरंगे गुब्बारे और गोद में बच्चे ले कर दौड़ती भागती गुब्बारे बेच रही थी , जिसकी गाड़ी में बच्चे होते वह खरीद लेते ।

अब वह मेरी कार के पास आ गयी थी और गुब्बारे दिखा कर खरीदने का आग्रह करने लगी ।

मैंने कार का काँच गिराया और उससे भाव मोल करने लगा ।

मैंने कहा : ” कितने के दिये ? “

उसने कहा :” दस रूपये का एक साहब “

मैंने कहा :” पन्द्रह के दो, दे दो ।”

उसने कहा : नहीं साहब , कम नहीं होंगे।”

अब मेरी उत्सुकता जागी , हरी लाईट होने में समय था ।

मैंने कहा : ” भाई भाव मोल करके बेचोगी तो ज्यादा बिक जायेंगे और पैसे भी ज्यादा मिलेंगे “

उसने कहा : ” साहब ये गुब्बारे मेरे नहीं है, वो उधर जो दुकान के अंदर गुब्बारों में हवा भर रहा है , उसके हैं , वह मुझे एक बार में दस गुब्बारे देता है , जब ये बिक जाते हैं और मैं उसे सौ रूपये दे देती हूँ, तब वह मुझे बीस रूपये देता है और फिर से दस गुब्बारे देता है । “

मैने देखा उसका बच्चा भी ललचाई निगाह से गुब्बारों को देख रहा था लेकिन वह उसे हाथ लगाने नहीं रही थी ।

उसका कहना था कि ” अगर एक भी गुब्बारा फूट गया तो नुकसान की भरपाई उसे ही करनी पड़ेगी ”

अब उसके लिए मेरी सहानुभूति जागी ।

मैंने कहा : ” मैं दस गुब्बारों के पैसे दे रहा हूँ, तुम मुझे दो, दे दो , बाकी गुब्बारे अपने बच्चे को खेलने के लिए रख लो या किसी और को बेच कर पैसे काम में ले लेना “

उसने कहा : ” नहीं साहब , मेरे पति अब इस दुनियां में नहीं है , उनका कहना था कि:

” मेहनत मजदूरी करना लेकिन मुफ्त का पैसा और सुविधाएं मत लेना । सुबह शाम बरतन साफ करती हूँ दूसरों के यहाँ खाना बनाती हूँ और दोपहर को गुब्बारे

बेचती हूँ “

तभी हरा सिग्नल हो गया मैंने जल्दी से उसे बीस रूपये दिये, कार आगे बढ़ा दी और उसकी खुद्दारी दिल को छू गयी ।

स्वलिखित

लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल कैम्प पुणे

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