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गुट और गुटबाजी

क्या दिन थे वो याद आते है
सब मे भाईचारा सब साथ थे।

जहां मर्जी, गप्पे हांकने बैठ गए।
कंही हंसी-मजाक कंही ठहाके लगा आए।

बने जब से गुट, सब गुटबाजी के शिकार हो गए
ना वो प्रेम रहा ना वो प्यार,सबके दुश्मन तैयार हो गए।

खड़े थे कुछ आग लगा हाथ सेंकने को
आज हर एक अपनी हाथ जला बैठें।

जो थे नायक वो तो नारो में लुट गए
राजनीतिज्ञ दुकानें लगा के बैठ गए ।

जब बात हुई सत्य-असत्य की तो
शरीफ चुपचाप मौन ओढ़ बैठ गए।

लोग सोचें कि बरगद में छांव होती है
पर, बरगद के भ्रम में बबूल के छांव में जा बैठे।

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रीतेश माधव
रीतेश माधव
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