गीत

“बेवफ़ा सनम”
दिल में बसाके मुझे,हुई तू पराई रे
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?

(1)
वादा किया था तुमने,साथ तुम निभाओगी
राह में अकेला मुझे ,छोड़के न जाओगी
ख़ाक में मुझे मिलाके ,चली हरजाई रे।
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?

(2)
तू ही मेरा प्यार था तेरा इंतज़ार था
रब से भी ज़्यादा मुझे तेरा एतबार था
ठुकरा के न जा मुझको,की बेवफ़ाई रे।
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?

(3)
शीशे सा दिल था मेरा चोट खाके रो दिया
पत्थर से दिल लगाके चैन मैंने खो दिया।
हसरतों का खून किया,अरे सौदाई रे।
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?

(4)
किसी गैर की मेंहदी हाथ में रचाई है
अपनों के बीच बैठी आज क्यों लजाई है?
शिकवा करूँ क्या तुझसे, आँख भर आई रे।
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?

(5)
शादी मुबारक तुझको,भूल जा ज़माने को
खुशियाँ मिले जीवन में चली घर बसाने को
मौत को गले लगाके,पा लूँ रिहाई रे।
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?

(6)
हाल तेरा क्या होगा, यही ग़म सताता है
जिंदा रहूँगा दिल में प्यार ये बताता है।
ज़िंदगी की राहों में,कैसी तन्हाई रे।
बेवफ़ा सनम तुझसे मिली क्यों जुदाई रे?
दिल में बसाके मुझे,हुई तू पराई रे…।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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