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गीत

“नन्हीं परी”
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ख्वाबों की नगरी से चलकर
घर परी अनोखी आई है,
अरमानों की डोली चढ़कर
मन द्वारे खुशियाँ लाई है।

अलसाई किरणों ने आकर
उपवन में फूल खिलाए हैं
सूरज, चंदा , प्रीत सितारे
सब साथी बनकर आए हैं।
दुआ की खुशबू छवि सलौनी-
बाहों में आ मुस्काई है।
घर परी अनोखी आई है।।

काले कुंतल मुख को चूमें
नीली अँखियाँ मटकाती है
तितली से पर फैला अपने
रुनझुन गुड़िया इठलाती है।
दादी, नानी लोरी गाएँ-
बिटिया ने ली अँगड़ाई है।
घर परी अनोखी आई है।।

नन्हें पग से छमछम करती
किलकारी भर मुझे रिझाती
पापा के काँधे पर चढ़ कर
टिकटिक घोड़े सैर कराती।
जब-जब गाल फुलाकर रूँठी-
मचा गुदगुदी दुलराई है।
घर परी अनोखी आई है।।

उड़न खटोले बैठ रात को
परियों के घर हो आती है
लाल परी से किस्से सुनकर
जादू की छड़ियाँ लाती है।
उससे मेरे सपने सारे-
तुतलाकर वो शरमाई है।
घर परी अनोखी आई है।।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
वाराणसी(उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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