कविता · Reading time: 1 minute

गीत

मैं खुद के साथ हूँ
फिर भी अकेला
गीत गाता हूँ
नयन में आँसुओं की धार लेकर
गुनगुनाता हूँ।
समर बेचैन तो करता
हृदय में हूक भी उठती
ये रिश्ते दिल जलाते हैं
यही सबको बताता हूँ।
हृदय में पीर का पर्वत छुपाए
मुस्कराता हूँ
मैं खुद के साथ हूँ
फिर भी अकेला
मानकर सबको झमेला
नयी कुछ बात कह
जग को जगत से मैं बचाता हूँ
ये रिश्ते दिल जलाते हैं
यही सबको बताता हूँ।
मैं सबके साथ हूँ
फिर भी अकेला
गुनगुनाता हूँ
दुश्मनों से प्यार के रिश्ते निभाता हूँ
मुस्कुराकर,गुनगुनाता गीत गाता हूँ
मैं खुद के साथ हूँ
फिर भी अकेला
इस जगत का एक झमेला
गीत को लिखकर
हृदय में प्राण पाता हूँ।
कृपा मित्रों की नित बरसे
यही है कामना मेरी
टिप्पणी में भर रहे संदेश पाता हूँ
निरंतर मुस्कराता हूँ
हृदय से गीत गाता हूँ
मैं सबके साथ हूँ
फिर भी अकेला
मुस्कुराता हूँ।
-अनिल कुमार मिश्र

1 Like · 2 Comments · 47 Views
Like
Author
अनिल कुमार मिश्र शिक्षा-एम ए अंग्रेज़ी,एम ए संस्कृत,बी एड जन्म 9.6.1975,राँची,झारखंड विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित काव्य संकलन'अब दिल्ली में डर लगता है'(अमेज़न,फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध) लगभग 20…
You may also like:
Loading...