गीत

आधार छंद–वाचिक भुजंग प्रयात
(मापनीयुक्त मात्रिक)
मापनी- लगागा लगागा लगागा लगागा
समान्त -आना ,पदान्त -न आया
****
तुम्हें भाव अपने दिखाना न आया,
कभी प्यार के गीत गाना न आया।

तुम्हें एक पाती कभी जो लिखी थी,
मुलाकात की बात उसमें कही थी,
कि दस्तूर मुझको निभाना न आया
तुम्हीं से कहूँ क्या बताना न आया ।
कभी प्यार के गीत …

छिपाते रहे राज हम आपसे जो,
शरारत निगाहें कि करने लगी थीं
नजर से हमें क्यों छुपाना न आया।
कभी पास अपने बुलाना न आया
कभी प्यार के गीत …

नजर जो उठी आपकी इस तरह से ।
जमाने की’ बातें सताने लगी थीं
बसायें जहां हम धवल चाँदनी में ।
सपन क्यों हमें ये सजाना न आया ।।
कभी प्यार के गीत …

कहानी हमारी अधूरी रही थी,
तड़प आज भी वो सताती रही है,
उलझती रही डोर मन की सदा जो ,
अहम को हमें क्यों मिटाना न आया ।
कभी प्यार के गीत …

स्वरचित
अनिता सुधीर

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