गीत

“बेटी”

पिता के शीश की पगड़ी बनीं अभिमान हैं बेटी,
दिलों को जोड़कर रखतीं घरों की शान हैं बेटी।

यही गुरु ग्रंथ की बानी यही गीता हमारी हैं,
यही दुर्गा यही काली यही सीता हमारी हैं।
दुआओं से भरी नेमत पिता की कामना प्यारी,
चहकती कोयलें आँगन बनी आराधना प्यारी।
जिधर जाएँ उजाले सी खुशी के रंग भरती हैं-
पिता की गर्व थाती बन बढ़ाती मान हैं बेटी।
दिलों को जोड़कर रखतीं घरों की शान हैं बेटी।।

कभी पत्नी कभी जननी बनीं दुख-दर्द सहती हैं,
निभातीं लाज दो कुल की समर्पित भाव रखती हैं।
भरे अपमान की झोली सभी नाते निभाती हैं,
जलाकर कर्म की बाती हृदय से तम मिटाती हैं।
बनीं कमज़ोर का संबल उठातीं बोझ ये कुल का-
बहातीं नेह की धारा सुखों की खान हैं बेटी।
दिलों को जोड़कर रखतीं घरों की शान हैं बेटी।।

न कम हैं बेटियाँ सुत से लुटाकर प्यार क्या पाया,
बिना बेटी महल सूने सदा देतीं सुखद छाया।
शिवाला घर हुआ जिनसे उन्हें मत कोख़ में मारो,
करें जो भ्रूण हत्या तुम उन्हें बेखौफ़ ललकारो।
शपथ खाओ बचा अस्तित्व निज पहचान दोगे तुम-
सँवारो ज़िंदगी इनकी जगत सम्मान हैं बेटी।
दिलों को जोड़कर रखतीं घरों की शान हैं बेटी।।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
महमूरगंज, वाराणसी(उ.प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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