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गीत -- भारत माता

टुकड़ा नहीं धरा का भारत , ये जननी है माता है
हम कागज पर नहीं नागरिक , माँ बेटे का नाता है

शीर्ष हिमालय पावन जिसका
तल छूते है सागर को
पर्वत नदियाँ समतल धरती
और चाहिए क्या नर को
ले अवतार जहाँ खुद ईश्वर
मानव के दुख हरते है
वेद पुराणों की रचना कर
नर को शिक्षित करते है
चन्दा सूरज पशु वृक्षो को , देव जहाँ माना जाता
कंकर कंकर में शंकर जो , सबका भाग्य विधाता है
टुकड़ा नहीं धरा का —-

सब नदियाँ गंगा है अपनी
पूजा करते हम जिनकी
वेदों ने कह मार्ग मोक्ष का
बता महत्ता दी इनकी
बूँद बूँद में भरा है अमृत
सब को ये जीवन देती
सीख हमें देती बदले में
नहीं किसी से कुछ लेती
निकल जिधर से गयी वहाँ पर , जन्म सभ्यता ने पाया
पाप हरे उसके जो डुबकी , आकर कभी लगाता है
टुकड़ा नहीं धरा का —-

तुलसी पीपल की पूजा या
हाथ जोड़कर अभिवादन
माथे पर हो तिलक लगाना
बैठ धरा पर हो भोजन
अलग गोत्र में करना शादी
दक्षिण सिर करके सोना
चरण बड़ों के झुककर छूना
या सिर पर चोटी होना
इन तथ्यों के पीछे कारण , छिपे हुए है वैज्ञानिक
जुड़ा ज्ञान से धर्म सनातन , ये विज्ञान बताता है
टुकड़ा नहीं धरा का —-

सौ पापो को कृष्ण यहाँ पर
हँसता हँसता सहता है
कमजोरी ये नहीं हमारी
शौर्य खून में बहता है
विजय राम की लंका पर या
हो कुरुक्षेत्र महाभारत
दुष्टो का संहार सदा से
रही हमारी है आदत
जीवन जीने की शिक्षा सब , मिली विश्व को भारत से
सच्चा ज्ञान यहाँ वेदों का , हमको पथ दिखलाता है
टुकड़ा नहीं धरा का —-

मनोज मानव

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मनोज मानव
मनोज मानव
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गीतकार / गीतिकाकार / छंदकार
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