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गीतिका

Rishav Tomar (Radhe)

Rishav Tomar (Radhe)

गज़ल/गीतिका

June 19, 2017

प्यार मेरा एक नदी था,वो बूँद हो गया
मैं खुशियों का ताज था खण्डर हो गया

सब कुछ बड़ा सा, मैं चाहते चाहते हुये
दो हजार के नोट से छुटा पैसा हो गया

चिन्ता,फिक्र,परेसानी,जिमेदारी कुछ भी नही
लेकिन आज हम भी इनके कारोबारी हो गये

बिल्कुल फूलों जैसा किरदार था जीवन में
लेकिन आज मैं काँटो की सवारी हो गया

कल कुंभकर्ण की तरह हमेशा बेफिक्र सोता था
लेकिन चाहत में मीरा की तरह साधक हो गया

कल दिन रात दोस्तो की मदद करता था मैं
लेकिन आज वक्त के हाथों खुद गिरवी हो गया

प्रेम मोहबत तसली से रहता था अपने घर मे
तेरे जाने पर सूखती नदी की मछली हो गया

थी हवाये मुस्कुराती सी ऋषभ ,और गाती धूप
मगर प्रदूषण का इन सब पर पहरा हो गया

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Author
Rishav Tomar (Radhe)
ऋषभ तोमर अम्बाह मुरैना मध्यप्रदेश से है ।गणित विषय के विद्यार्थी है।कविता गीत गजल आदि विधाओं में साहित्य सृजन करते है।और गणित विषय से स्नातक कर रहे है।हिंदी में प्यार ,मिलन ,दर्द संग्रह लिख चुके है

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