गीतिका

गीतिका
2122 2122 2122 212
ऋतु वसंत आई लगी कुदरत खिजाना आ गया
फूल सब खिल –मिल लगे मानो जताना आ गया|

ड़ाल आमों हरित रंगतो में पकाना आ गया
तितलियाँ झूमी सुना गीतों हिलाना आ गया |

स्वर विहंगो का सुना धूने बनाना आ गया
मौज आई पहर ले माना झुलाना आ गया|

प्रेम में सुन्दर नया सा गान गाना आ गया
सुवह आदत मौन किरणों संग निभाना आ गया|
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ऋतु मधुमास राग द्वेष भूला छिपाना आ गया
सीख मानव अब भि रोतो को मनाना आ गया |
रेखा मोहन २८ /२/२०१७

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