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गीता के स्वर (7) ब्रह्म और ज्ञानी

मैं ही हूँ ‘ब्रह्म’
अष्ट प्रकृतियों का धारक
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश
और मन, बुद्धि तथा अहंकार
यही तो हैं
मेरी अष्ट प्रकृतियाँ
यही तो है
‘अपरा’
‘परा’ प्रकृति भी मेरी ही है
मैं ही हूँ-
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
और ‘प्रलय’ का कारण.
कौन है मुझसे श्रेष्ठ ?
कोई भी तो नहीं
सब निहित है मुझमें
सभी भाव
सात्विक, राजस, तामस
मुझसे ही उत्पन्न हैं
मूढ, नराधम, माया से ग्रसित
आसुरी प्रकृति का आश्रय लिए
कहाँ आ पाते मेरी शरण में
ब्रह्म के निकट.
वह ‘ज्ञानी’ ही है
जो याद करता है
ब्रह्म को सदैव
दोनों एक दूसरे में समाहित हैं
ब्रह्म की आत्मा है ‘ज्ञानी’
आश्रित है ब्रह्म का
ज्ञाता है ब्रह्म का
सम्पूर्ण अध्यात्म का
और समस्त कर्मों का भी.

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