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गीता के स्वर (14) परम ज्ञान

ज्ञानों में श्रेष्ठ है ‘परम ज्ञान’
यह प्रलय काल में भी
साथ देता है
व्यथित नहीं होने देता.
प्रकृति से उत्पन्न ‘सत्त्व’, ‘रज’ और ‘तम’
अविनाशी आत्मा को
बाँध लेते हैं देह में
‘सत्त्व’
बाँधता है जीवात्मा को
‘सुख’ व ‘ज्ञान’ की आसक्ति में
‘रजोगुण’
बाँधता है जीवात्मा को
‘कर्म’ के साथ
‘तमोगुण’
होता है अज्ञानजन्य
जो बाँधता है
जीवात्मा को
‘प्रमाद’, ‘आलस्य’ व ‘निद्रा’ के द्वारा.

‘सत्त्वगुण’ बढ़ता है
‘रज’ व ‘तम’ को रौंदकर
‘रजोगुण’ दबाता है
‘सत्त्व’ व ‘तम’ को
और ‘तम’ आगे बढ़ता है
ऐसे ही
‘सत्त्व’ व ‘रज’ को रौंदकर

‘सत्त्वगुण’ बढ़ने का संकेत है-
समस्त इन्द्रियों से
ज्ञान के प्रकाश की उत्त्पत्ति.
‘लोभ’, ‘अशांति’, ‘स्पृहा’
संकेतक हैं-
रजोगुण के बढ़ने के
उसके विस्तार के
‘प्रमाद’, ‘मोह’
उत्पन्न होते हैं
‘तमोगुण’ की प्रमुखता से
‘भक्तियोग’ के मार्ग पर चलने वाला
प्राप्त करता है
‘परम ज्ञान’
और योग्य हो जाता है
‘ब्रह्म भाव’ की प्राप्ति के.

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