गीगो सिद्धांत जीवन की सच्चाई

कम्प्यूटर का गीगो (GIGO- Garbage in,Garbage out)का सिद्धांत है –
■ गलत अंदर डालिए; गलत बाहर आएगा ।
■ सही डालिए; सही बाहर आएगा ।
■अच्छा डालिए; अच्छा बाहर आएगा ।
हम जितना डालते है, उतना ही निकालते है ।हमारा अवचेतन मन भेदभाव नही करता । हम जो कुछ भी अपने अवचेतन मन मे डालेंगे, वही उसे स्वीकार कर लेगा, और वही बात हमारे व्यवहार मे उतरेगी ।
टेलीविजन ने हमारे नैतिक मूल्यो, सोचने के ढंग और संस्कृति पर काफी हद तक अच्छा, या बुरा असर डाला है । जहां उसने हमे बहुत -सी अच्छी और फायदेमंद सूचनाएँ दी है,वही यह हमारी रूचियो मे घटियापन भी लाया है,इसने हमारी नैतिकता को भ्रष्ट किया है, और बच्चो मे अपराध की प्रवृत्ति को बढाया है । 18 साल की उम्र तक बच्चे टेलीविजन पर हिंसा के लगभग दो लाख दृश्य ( Scene ) देख चुके होते है ।☆
विज्ञापनदाता अपने दर्शको को प्रभावित करने मे माहिर होते है ।किसी बङी घटना के दौरान कम्पनियाँ 30 सेकेंड के विज्ञापन के लिए लगभग दस लाख डॉलर खर्च करती है । यकीनन उन्हे इसका फायदा मिलता है । हम किसी खास स्तर ( Brand) के साफ्ट ड्रिंक या टूथपेस्ट का विज्ञापन देखकर सुपरमार्केट से उसे ही खरीद लाते है । दरअसल हम साफ्ट ड्रिंक को नही उसके ब्रांड को खरीदते है । क्यों ? इसलिए कि हमारे दिमाग को उसी ढंग से ढाला गया है, जब हम टेलीविजन मे यह विज्ञापन सुनते है ” रालको टायर सबसे सस्ता सबसे अच्छा ” तब हमारे साइकिल टायर खराब होने पर दुकानदार से यह पूछने पर कि कौन सा टायर लगवाओगे हम झटपट बोल बैठते है, रालको टायर ये सब तो विज्ञापन की ही असर है न । जब हम टी वी देखते है या रेडियो पर कोई विज्ञापन सुनते है, तो चेतन मन उस पर भले ही न गौर कर रहा हो, लेकिन हमारा अवचेतन मन खुला होता है, और हम प्राप्त होने वाली हर उस चीज को स्वीकार कर रहे होते है । क्या आपने कभी किसी टेलीविजन से की है? जाहिर बात है नही ।जब हम पिक्चर देखते है तो, हँसते और रोते भी है, क्योकि हमारे अंदर डाला गया भावनात्मक इनपुट, भावनात्मक आउटपुट के रूप मे फौरन बाहर आता है ।यानि कि इनपुट को बदलने प्राप्त आउटपुट अपने आप बदल जाता है ।

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