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गिरगिट

इस रंगीन जगत से गिरगिट
तुम बाहर आ जाओ आज
रंग बदलना बंद करो अब
धोती-कुरता धारो आज।

रंग बदलना तेरा प्रतिपल
मानव को बहकाता है
वस्त्रहीन होकर अब मानव
झट बेरंग हो जाता है।

कभी लाल पीला वह होता
हरा कभी हो जाता है
मन उसका नीला हो जाता
जहरीला हो जाता है।

नंगा गिरगिट,मानव नंगा
नंगेपन की दौड़ लगी है
नंगेपन में रंग बदलना
मानवता अब सीख रही है।

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अनिल कुमार मिश्र
अनिल कुमार मिश्र
हज़ारीबाग़,झारखण्ड
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अनिल कुमार मिश्र विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित काव्य संकलन'अब दिल्ली में डर लगता है'(अमेज़न,फ्लिपकार्ट...
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