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गांव की मिट्टी मे शोधी महक है।

Vindhya Prakash Mishra

Vindhya Prakash Mishra

कविता

July 16, 2017

गांव की शोधी महक है
पेड के है छाव चिडियो की चहक है
संस्कारो से अभिसिंचित लोग है
कार्य मे मिश्रित यहां पर योग है
सादगी है मूलता है न बनावट
मिल रहे है प्रेम से न है अदावत
बोलियो मे प्रेम है मिठास है
गांव की मिट्टी जरा कुछ खास है
प्रकृति है शुद्ध हवा साफ है
कम है कीमत बस्तु की दर हाफ है
मिलकर रहते कुटुम इकसाथ है
मेहनत होती है यहां दिन रात है
कदम दर कदम बडो की सलाह
काश मिल जाता पुराना गांव नीम की छांह
शोधी महक मिट्टी की गांव मे बुलाती है
याद आती गांव की आंखे भर आती है
समाज है मिलकर मदद करता यहां
ढूंढता गांव सा मिलता कहां है
आम पीपल नीम की घनी छांव मे
खेलते थे दिन दिन कई जब गांव मे
टूटे खिलौने से ही मिल जाती खुशी थी
आज वैसी खुशी मिलती नही है
धऩ तो मिलजाता कृत्रिमता नगर मे
जहर है प्रदूषण बचकर रहो शहर मे

विन्ध्यप्रकाश मिश्र

Author
Vindhya Prakash Mishra
Vindhya Prakash Mishra Teacher at Saryu indra mahavidyalaya Sangramgarh pratapgarh up Mo 9198989831 कवि, अध्यापक
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