लघु कथा · Reading time: 2 minutes

गोधूलि लग्न के फेरे

हमारे गांव में एक शादी थी। लड़की वाले बैठा ब्याह(बारात न जाकर, वधु पक्ष जब वर पक्ष के गांव में आकर शादी की सारी रस्म पूरी करता है) करने आये हुए थे।

आनन फानन में गांव के ही दो पंडितों को निश्चित किया गया, एक वर पक्ष की तरफ से और दूसरा वधु पक्ष की तरफ से।

उन पंडितों में एक मेरे स्वर्गीय दादाजी और दूसरे दादा जी के दूर के रिश्तेदार, जो दादाजी से भी उम्र मे बड़े थे।

चूंकि उम्र में वो बड़े थे, दादाजी उनका पूरा सम्मान करते थे।

उस समय सारा गांव वधु पक्ष के साथ जरूरी इन्तजाम मे जुट गया ताकि उन्हें नई जगह में किसी किस्म की परेशानी न हो।

फेरों के समय के लिए दादाजी के रिश्तेदार से सलाह ली गई, उन्होंने फ़ौरन कह दिया कि गोधूलि लग्न में फेरे होंगे।

दादाजी को जब ये बात पता चली तो वह उनसे मिलने पहुंचे और कहा कि भाई साहब वर वधु के नाम के हिसाब से तो सिंह लग्न ही उत्तम रहेगा पर आपने फेरो के लिए शाम वाला मुहूर्त बता दिया?

उन्होंने कहा, मुझे भी मालूम है कि कौन सा लग्न उत्तम है।

पर देखो कड़ाके की सर्दी पड़ रही है, मुझसे तो रात मे जागा न जाएगा और तुम्हारी इस सही गणना की वजह से सारी बारात को भी रात भर जागना पड़ेगा।

वैसे जो लग्न मैंने बताया है वो भी शुभ ही है।

और सुनो, शादी के बाद अगर लड़के और लड़की को लड़ना होगा तो ये कौन सा मुहूर्त देख कर लड़ने वाले हैं?

शादी गोधूलि लग्न मे ही हुई!!

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