लघु कथा · Reading time: 1 minute

चौपड़ का खेल

हरि बाबू के ऊंचे बरामदे में गर्मियों के दिनों में रात को खाना खाने के बाद घंटो चौपड़ खेलना उन दिनों एक आम बात थी।

रोज रात को बरामदे की सफाई करके, चटाई बिछाकर लालटेन की रोशनी में ये खेल लगभग रोज होता था।

खेलने वालों से ज्यादा देखने वालों की भीड़ लगी होती थी, कुछ बगल मे बैठकर तो कुछ खड़े होकर हर बार पासा फेकने पर अपनी राय और उत्साह बढ़ाने से नहीं चूकते थे।

ऐसे ही एक दिन खेल में , हरि बाबू चेयर लगाकर अपने पुत्र को खेलते हुए देख रहे थे। आज ग्रह दशा का फेर था या पुत्र का नसीब कुछ मंदा था कि पासे साथ नही दे रहे थे ,वो लगातार तीन चार बाजियां हारते चले गए।

पांचवी बार जब बिसात बिछी, हरी बाबू ने देखा इस बार भी बाजी हाथ से निकल जायेगी।

फिर उनसे रहा नहीं गया, पुत्र का हारा हुआ गमगीन मुँह अब उनसे देखा नहीं गया। पुत्र मोह में वे उठे और गोटियों को हाथों से बिखेर कर बोले, चौपड़ हमारी, चटाई और लालटेन भी हमारी और हमारे ही लड़के को ही बेतोड़ी?

चलो भागो यहाँ से सब कोई।

बुज़ुर्ग के इस गुस्से को देखकर सब धीरे धीरे उठ खड़े हुए और अपने अपने घर चले गए।

खैर ये तो बीते जमाने की बात थी।

पर आज भी इस सोच में कोई बदलाव है क्या?

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