लघु कथा · Reading time: 1 minute

नदी के रूप

ये घटना मेरे बड़े भाई साहब की आपबीती है। एक बार संस्कृत के अध्यापक, रामचंद्र जी, कक्षा में आये ,कुछ देर पढ़ाने के बाद अचानक उनकी ओर देख कर बोले, नदी के रूप को विस्तार में बताओ।

भाई साहब इस आकस्मिक प्रश्न से घबरा गए पर उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। आज चूंकि वो विद्यालय थोड़ी देर से पहुंचे थे इसलिए बैठने की जगह जरा पीछे की ओर थी।

ये बात उनके पक्ष में थी।

उन्होंने सधे हुए शब्दों में बोलना शुरू किया – नदी ईकारांत स्त्रीलिंग संज्ञा है। संज्ञापदों के रूप, विभक्तियों के अनुसार इस प्रकार हैं।
प्रथम विभक्ति- नदी, ……….नद्य:
द्वितिय विभक्ति- नदीम के बाद स्वर धीमे पड़ने शुरू हुए पर होठों का हिलना चालू रहा।

फिर संबोधन पर आकर स्वर तेज होकर – हे नदि ! ….. हे नद्य: ! पर जब उन्होंने खत्म किया,
तो संस्कृत के अध्यापक ने उन्हें ख़ुश होकर बैठ जाने को कहा।

भाई साहब ने चैन की सांस ली और सोचा,पहली बेंच पर खड़े होकर ये धाराप्रवाह उत्तर कतई मुमकिन नहीं था।

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