कविता · Reading time: 2 minutes

गांधारी

गांधारी माना के बहुत पतिव्रत नारी थी ,
अंधे पति हेतु उसने नेत्रों पर पट्टी बांध ली थी ।

उसने तो अपना पत्नी धर्म इस प्रकार निभाया,
अपने पति की खातिर नेत्रों का त्याग किया।

मगर यह त्याग का आवश्यक और उचित था?
जी नहीं ! यह त्याग बुद्धिमत्ता का नही था ।

बुद्धिमत्ता तो यह होती वो अपने नेत्र खोल के रखती ,
अपने नेत्र बंद करने के बजाय पति के नेत्र बनती।

उसे भला बुरा,न्याय अन्याय में फर्क समझती ,
और उसे अधर्म के रास्ते पर चलने से रोकती ।

उसके सुकर्म से पति को सत्ता की लालसा न होती ,
अपने अनुज की संतान के प्रति भी ममता होती ।

गांधारी ने नेत्र खुले रखे होते तो संतान न बिगड़ती,
उन्हें बचपन से अनुशासन और धर्म का पाठ पढ़ाती।

उन्हें मानवता की राह में चलने पर सदा प्रेरित करती ,
उनके हर क्रिया कलाप ,गतिविधि पर अंकुश रखती ।

गांधारी संतान के अंधे मोह में किंकर्तव्यविमुड़ होती,
और नही अपने पति धृतराष्ट्र को होने वो देती ।

गांधारी के भ्रात प्रेम ने घर में भाइयों में फूट पड़वाई,
उसके भाई शकुनी ने कोरवों में घृणा की नींव डलवाई।

यदि गांधारी उसे भेज देती वापिस गंधार उचित होता,
कौरव और पांडवों का परस्पर वैमनस्य न पनपता।

ना ही भरी सभा में कुलवधु द्रोपदी का अपमान होता ,
और न ही परिवार के बड़े बुजुर्गों का मान भंग होता।

महान राजा भरत के वंश में यह अधर्म आया कहा से?
यह अधर्म पनपा गांधारी व् धृतराष्ट्र के पुत्र मोह से।

श्री कृष्ण भगवान को वंशनाश का श्राप क्यों मिला ?
उन्होंने बस फर्ज निभाया इसमें उनका क्या दोष था ?

जग में अधर्म का नाश हेतु उन्होंने अवतार लिया था,
इस पर भी उन्हें श्राप देना उनके साथ घोर अन्याय था,

इस घोर अन्याय को भी कृपा निधान सह गए,
एक मूर्ख स्त्री के द्वारा प्राप्त जहर को भी पी गए।

महाभारत केवल अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश नही देती ।
बल्कि यह हर मां बाप को अपनी संतान को अनुशासन में रखने का भी संदेश देती है।

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