ग़ज़ल

हर वक़्त हूँ किसी न किसी इम्तिहान में
शायद इसीलिए है ये तल्ख़ी ज़ुबान में

अपनी अना की क़ैद से बाहर निकल के देख
पैवंद लग चुके हैं तेरी आन-बान में

सोह्बत बुरी मिली तो ग़लत काम भी हुए
वैसे कोई कमी तो न थी ख़ानदान में

ग़म भी, ख़ुशी भी, आह भी, आँसू भी, रंज भी
सबको जगह मिली है मेरी दास्तान में

नींदों की जुस्तजू में लगे हैं तमाम ख़्वाब
सज-धज के आ गया है कोई उनके ध्यान में

दरवाज़ा खटखटाए चले जा रहे हो ‘नाज़’
लगता है कोई शख़्स नहीं है मकान में

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