गीत · Reading time: 1 minute

ग़रीबी

……………. #गरीबी ……………..
है क्षुधा हमको सताती, सकल सुविधा हीन हैं।
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

ये ग़रीबी बदनसीबी, दिवस कटते हैं नहीं।
कण्टको सा बोझ जीवन, विघ्न छटते हैं नहीं।।
अश्रुओं के संग रहना, हर दिवस गमगीन है।
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

पूस हो या माघ हो पर, कब हमें आराम है।
बैलों के बन्धु रहे हम, काम ही बस काम है।।
पेट खाली हो भले ही, कर्म में हम लीन हैं।
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

सख्त जीवन क्षीण यौवन, नयनजल पीते रहे।
घर में आटा है न वस्तु, सुख बिना रीते रहे।।
मध्य मृत्यु दिनता के, तन्तु एक महीन है।
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

सर पे छत न अन्न घर में, मौत भी आती नही।
अश्क पीने से भला क्यो, भूख ये जाती नहीं?
भूख भोजन भीख ही बस, पंथ अपने तीन हैं।
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

हे विधाता ! दी हमें क्यों, जिन्दगी ऐसी भला?
पुष्प हम उपवन तुम्हारा,क्यो भला हमको छला?
पंथ जीवन का हमें क्यो, लग रहा संगीन है?
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

पीर पर्वत से बड़ी पर, कौन तारणहार है।
सृष्टि पालक से मिली यह, वेदना उपहार है।।
पत्थरों पर सर पटकना, भावनायें खिन्न हैं।
जन्म से ही हैं अभागे, भाग्य से भी दीन हैं।।

✍️पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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