गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल

कर्मों का फल मिलता है कब
इंसां फूल सा खिलता है कब

रंग बिरंगी इस दुनिया में
साथ सभी का मिलता है कब

बंद हुए दरवाज़े घर के
पत्ता कोई हिलता है कब

उम्मीदों का ये दामन भी
फट जाने पर सिलता है कब

“सीरत” झूठ कड़ा इतना है
छिलका उसका छिलता है कब

शीला गहलावत सीरत
चण्डीगढ़

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