ग़ज़ल

मिले कहीं पर बात हो जो लाज़मी ले जाईये ।
खोजकर कोई भीड़ में से आदमी ले जाईये ।
श्याम-पट पर उकेरे जो अक्षरों-सा चमकता हो ,
ज़िंदग़ी का वह सबक जो हो हसीं ले जाईये।
तीरग़ी को चीरकर भी मुल्क औ’ सारे जहाँ की,
ख़त्म न हो जो कभी वह रौश़नी ले जाईये ।
तश़रीफ़ लेकर आईये तश़रीफ़ भी रखिये यहाँ,
गले मिलकर प्यार की थोड़ी ज़मीं ले जाईये।
‘ईश्वर’ तुम्हारी राह में काँटे बिछाये ग़र कोई ,
बाग से चुनकर के उसको मालती ले जाईये ।
-ईश्वर दयाल गोस्वामी ।
कवि एवम् शिक्षक ।

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