ग़ज़ल

मैं हिंदू हूं मगर कुरान लिखता हूं,
तुम लड़ते हो चलो, मैं तुम्हारे लड़ाई की दास्तान लिखता हूं,

क्या फर्क है अपने अंदर उसे ढूंढो तुम,
मैं तुम्हारे मौत का फरमान लिखता हूं,

तेरे जिंदगी फस गई है एक हसीन मोड़ पर, तेरे लिए,
वक्त है, चलो ना, मैं तुम्हें उस हसीन मोड़ के नुकसान दिखाता हूं,

पीठ के पीछे मेरी बुराइयां करने वालों,
चलो गीनो, आज मैं तुम्हें तुम्हारी खामियां गिनाता हूं,

बंजर-बंजर कहकर जो छोड़ गए इस जमीन को,
आओ चलो साथ, एकता का मैं तुम्हें वहां एक हुजूम दिखाता हूं,

हर वक्त अपनी तंगी पर रोने वालों,
चलो, मैं तुम्हें कुछ भूखे बच्चों से मिला हूं,

और,
हर वक्त पैसा पैसा करने वालों,
वक्त है, चलो फिर, मैं तुम्हें कब्रिस्तान का मुआयना करवाता।

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