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ग़ज़ल

Brijraj Kishore

Brijraj Kishore

गज़ल/गीतिका

June 16, 2016

ग़ज़ल
बादलों का एक टुकड़ा, गगन में आया तो है।
बारिशों की ख़्वाहिशों ने, पँख फैलाया तो है।

कब से जाने जल रहे थे, धूप से ये तन-बदन;
और कुछ हो या न हो, कुछ देर को छाया तो है।

ख़ुद तो आया ही किसी राहत भरे ख़त की तरह;
साथ कुछ ठंडी हवा का, दौर भी लाया तो है।

हैं यहीं नज़दीक ही, हम मानसूनी क़ाफ़िले;
वहाँ से अपना यही पैग़ाम भिजवाया तो है।

इतना भी कम तो नहीं, ‘बृजराज’ तेरे वास्ते;
चन्द बूँदों ने सही, पर आज नहलाया तो है।

–बृज राज किशोर

Author
Brijraj Kishore
A retired LIC Officer of age 64+. Writing since 50 years. A collection named "एक पन्ने पर कहीं तो" published.
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