ग़ज़ल

ग़ज़ल
बादलों का एक टुकड़ा, गगन में आया तो है।
बारिशों की ख़्वाहिशों ने, पँख फैलाया तो है।

कब से जाने जल रहे थे, धूप से ये तन-बदन;
और कुछ हो या न हो, कुछ देर को छाया तो है।

ख़ुद तो आया ही किसी राहत भरे ख़त की तरह;
साथ कुछ ठंडी हवा का, दौर भी लाया तो है।

हैं यहीं नज़दीक ही, हम मानसूनी क़ाफ़िले;
वहाँ से अपना यही पैग़ाम भिजवाया तो है।

इतना भी कम तो नहीं, ‘बृजराज’ तेरे वास्ते;
चन्द बूँदों ने सही, पर आज नहलाया तो है।

–बृज राज किशोर

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