ग़ज़ल

‘शायरी अपनी जगह’

आशिकी अपनी जगह है बेकशी अपनी जगह।
मुफ़लिसी अपनी जगह है बेबसी अपनी जगह।

था मुकम्मल प्यार उनका बेवफ़ाई कर गए
ख़त जला यादें दफ़न कीं शायरी अपनी जगह।

साथ अपने ले उड़ी खुशबू गुलों से ये हवा
वादियों में आज भी है ताज़गी अपनी जगह।

सामने पकवान हैं मिष्ठान भी मौज़ूद हैं
आज माँ की रोटियों की है कमी अपनी जगह।

नूर से रौशन जहां है क्या नज़ाकत क्या अदा
देखकर चंदा लजाता सादगी अपनी जगह।

ज़िंदगी को और जीने की तमन्ना है अभी
सामने सागर हमारे तिश्नगी अपनी जगह।

दाग़ लगने से बचाया खेल ‘रजनी’ जान पर
आबरू अपनी जगह है दुश्मनी अपनी जगह।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
महमूरगंज, वाराणसी
संपादिका-साहित्य धरोहर

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