ग़ज़ल

“दिलकश यौवन”
1222 1222 1222 1222

नज़ाकत शोखियों ने रूप यौवन का सँवारा है।
तुम्हारी सादगी के हुस्न ने चंदा नकारा है।

खिली मुस्कान अधरों पर छटा जैसे बहारों की
सुनी धड़कन जुनूने इश्क ने हमको पुकारा है।

घनेरी जुल्फ़ मँडराकर करे रुखसार का चुंबन
नयन के तीर से घायल यकीनन दिल हमारा है।

चुरा खुशबू बदन से क्यारियाँ महकीं गुलाबों की
मिजाज़े नर्म दिल ने आब चेहरे का निखारा है।

खनकती चूड़ियाँ नींदें चुरातीं छेड़ कर सरगम
गरम अहसास सांसों का बना मेरा सहारा है।

टपकतीं केश से बूँदें लगें शबनम फ़िज़ाओं में
किया श्रृंगार धरती का बड़ा दिलकश नज़ारा है।

सुनहरे ख्वाब आँखों में सजाते सुरमयी महफ़िल
लिए अरमान का दर्पण तुम्हें ‘रजनी’ निहारा है।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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