गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल/नज़्म — सोच सकारात्मक

(ग़ज़ल/नज़्म — सोच सकारात्मक)
खामखां दिलेरी दिखाने में, कोई बड़ाई नहीं,
बेवजह ही जान गंवाने में, कोई भलाई नहीं ।

दुश्मन कर रहा कोशिशें, तेरे घर में सेंध की,
ढ़ील देखी नहीं कि उसने, धार पनाई नहीं ।

ये बाहर खराब हवा है, खुले में तू मत जा,
निशाना साध के बैठा है, वो तेरा भाई नहीं ।

समय बुरा है मगर ये, कुछ सिखा भी रहा,
कह नहीं सकते इसने, दूरियाँ मिटाई नहीं ।

सूखी रोटी मिले खाने में, साथ में जो गुड़ हो,
मत कहना मेरी थाली में, कोई मिठाई नहीं ।

तरसे फुर्सत के पलों को, हम मशीनी दौर में,
वो महफ़िलें बुरी रही जो, घर में सजाई नहीं ।

पक्ष-विपक्ष की सियासतें, एक सी हर दफा,
ठीक है जो कमजोरी उन्हें, तूने बनाई नहीं ।

मीडिया से दूर “अनिल”, सोच सकारात्मक,
हौसलों को किसी के ये, बीमारी हराई नहीं ।

©✍🏻15/05/2021
अनिल कुमार “खोखर”
9783597507,
9950538424,
anilk1604@gmail.com

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