ग़ज़ल .....घर अपना चलाता हूं

घर अपना चलाता हूं
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किसी के भी पसीने की, सही कीमत चुकाता हूं
मैं भी मजदूर हूं यारों, बहाकर ही कमाता हूं

मुझे बारिश की बूंदों से, कब निस्बत रही कोई
मेरा तन भीग जाता है , मैं जब रिक्शा चलाता हूं

ये सूरज भी कोई मुझसे ,हिमाकत कर नहीं सकता
मैं इसकी आग से ही तो, पसीनें को सुखाता हूं

पूस की सर्द रातों को ,क्या जानें महल वाले
मैं कोहरे की चादर को ,ओढ़ता हूं बिछाता हूं

मेरे बोझे से व्याकुल ,कभी होगी नहीं धरती
मैं अपने हिस्से का खुद ही, रोज बोझा उठाता हूं

मेरे बच्चों के ख्वाबों का, खिलौना टूट जाता है
बहुत रोता हूं खाली हाथ, जब मेले से आता हूं

किसी की देखकर चुपड़ी, कभी ना जी मेरा मचला
मैं रूखी सूखी खाकर ही, घर अपना चलाता हूं

ना चोरों से हमें खतरा, ना मौसम के तमाशे से
वक्त जैसा भी पड़ता है, मैं ऐसा ही ढल जाता हूं

थकन सारी खत्म पल में, मेरी हो जाती तब “सागर”
शाम को लौट कर ,बच्चों को सीने से लगाता हूं।।
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बेख़ौफ़ शायर …… डॉ.नरेश कुमार “सागर”
9897907490

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