गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ग़ज़ल :– आँगन में आत्मसमर्पण देखा !!

ग़ज़ल –: आँगन में आत्मसमर्पण देखा !!
गज़लकार–: अनुज तिवारी “इंदवार”

आग में झुलसी दुल्हन देखा !
जितनी भी सब निर्धन देखा !!
!
अम्बर के अडिग इरादों का !
आँगन में आत्मसमर्पण देखा !!
!
अरमानों के मण्डप पर बैठी !
उन सांसों की उलझन देखा !!
!
कहीं तड़फ़ती चूड़ी हाथों में !
कहीं खनकते कंगन देखा !!
!
नम आँखों के बोझिल आँसू में !
सागर का खारापन देखा !!
!
हुई प्रज्वलित लौ ज्वाला की !
जब आँखों नें दर्पण देखा !!
!
कहने को दुनियाँ अपनी पर !
कहीं नहीं अपनापन देखा !!

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