ग़ज़ल(आजकल)

आजकल कुछ ऐसा दस्तूर हो गया है।
पैसा ही सब का जी हुजूर हो गया है।

रिश्तों में अब पहले जैसा नहीं अपनापन;
शोहरत का ही बस सबको गुरूर हो गया है।

असलियत से, संस्कृति से मुंह मोड़ लिया;
पश्चिम का पूर्व पे अनोखा सरूर हो गया है।

फुर्सत के, हंसी ठहाको के पल खो गए हैं;
वक्त नहीं है यह ज़ुबां पर ज़रूर हो गया है।

पैसा कमाने की हौड़ में माँ -बाप को भुला;
बेटा समाज सेवी के नाम से मशहूर हो गया है।
कामनी गुप्ता***
जम्मू !

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