कविता · Reading time: 1 minute

“गलतियां”

आसानी से कह दिया तुमने कि
ऐसी ’गलतियां’ तो होते रहती है,
जो मेरी नज़रों में ’अक्षम्य अपराध’ है।
कहां से लेकर आते हो इतने उच्च स्तरीय सोच और विचार।
जिसके आगे नतमस्तक हों जाती हूं मैं।
जिन्दगी तबाह कर,
कहते हो अब सब ठीक कर दूंगा,
सब व्यवस्थित कर दूंगा।
क्या सही और व्यवस्थित करोगे तुम??
इतने सालों धोखा देकर,
मेरे समर्पण का मज़ाक बनाते रहे।
और कितनी आसानी से कह दिया तुमने
कि ऐसी ’गलतियां’ तो होते रहती हैं।

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PhD in Chemistry Worked as Prof at Engineering college
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