Jul 5, 2016 · कविता
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~~!!~~गर~~!!~~

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“ग़र, साँचों में ढले
दिन-रात होते,
लफ़्जों में लरजते
ना जज़्बात होते!
ग़र, होती आरज़ू
मंजिलें, खुद-ब-खुद तराशने की,
बैठे, हाथो पे धरे
ना हाथ होते!
ग़र, होती खुशकिस्मत
ख्वाईशें, दिलों की,
यूँ गवारा
ना अपने अरमान होते!
ग़र, होती अमन-पसंद
हसरतें, हर शख्श की,
हमपर हुकूमत करते दिखते –
हम जैसे ही, इंसान ना होते!!”_______दुर्गेश वर्मा

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Durgesh Verma
Durgesh Verma
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मैं काशी (उत्तर प्रदेश) का निवासी हूँ । काव्य/गद्य आदि विधाओं में लिखने का मात्र... View full profile
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