Jun 14, 2019
कविता · Reading time: 1 minute

गर्मी संताप

सूरज देवता कितनी आग बरसाओगे
गर्मी से पीडित लोगों को कितना तरसाओगे
भीषण गर्मी में ओर कितना तडपाओगे
क्या बादलो को आसमां की सैर नहीं कराओगे

नदी नाले तालाब सब सूख रहे
खेत खलिहान अपना रूख मोड़ रहे
हर घड़ी राहत की मंशा कर रहे
कुछ ओर नहीं बस पानी की आकांक्षा कर रहे

अब तो धरती भी कर रही विलाप है
भला यह कैसा अभिशाप है
सुरज देवता कुछ कम करो कहर
बादल की होने दो कुछ महर

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