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गरीब की आंखें

Naval Pal Parbhakar

Naval Pal Parbhakar

कविता

April 16, 2017

गरीब की आँखें

मलिन सा चेहरा
गिरती उठती हौले-हौले
तन पर फटे हुए कपड़े
जरूर ये आँखें
किसी गरीब की हैं ।
गरीबी की अकड़ ने
तोड़ कर रख दिये काँधे
टेढ़े-मेढ़े बिखरे बाल
निस्तेज निष्ठूर गोरे गाल
गड्ढ़ों में धँसती हुई सी
जरूर ये आँखें
कि सी गरीब की हैं ।
लक्ष्य बिन्दू पर अटकी सी
ज्यों दे रही चुनौती
हर तुफां से लडऩे की
सहमी दुख झेलने वाली
जरूर ये आँखें
किसी गरीब की हैं ।

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