कविता · Reading time: 2 minutes

गन्ना ना दे,भेली देंवे!

अपने बड़े बुजुर्गो से सुना था,
गन्ना ना दें,भेली देंवे!
सुन कर बड़ा अजीब लगता था,
यह वृद्ध ऐसा क्यों कहता है!

यह पहेली अब समझ में आई,
जब काम नहीं दिया जाता,
राहत पहुंचाई जाती है!

आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा है,
काम धंधा चौपट हो गया,
कमाई के साधन सीमट गये,
घर पर खाली बैठे,
निठल्ले से होकर रह गए!

रोजमर्रा के खर्चे,
कैसे चलाएं,
आमदनी सारी खर्च हो गई ,
जीवित रहने का संघर्ष है,
अर्थ व्यवस्था का संकट है!

सरकार मूकदर्शक बनी रही,
पांच किलो अनाज देकर,
अपने दायित्वों से मुक्त हो गई,
लौकडाऊन बन गया झंझट,

मर जाता है जब कोई,
भूख प्यास से,
अनाज पानी के अभाव से,
चर्चा खूब होती है,
मरा है भूख से,
यह स्वीकारोक्ति,
नहीं तब होती,

तर्क वितर्क का दौर चलता है,
भूख से यह कतई नहीं मरा है,
इसे बिमारी थी बड़ी भारी,
मरने की वजह,
भूख नहीं, थी बिमारी!

एक ओर कारण बताए जाते हैं,
दूसरी ओर घर पर राशन के ढेर लगाए जाते हैं,
अधिकारियों की आवाजाही होती है,
दोषारोपण भी चलता रहता है,
और घोषणाओं का उदघोष भी होता है,
राहत राशि का ऐलान किया जाता है,
सरकारी आदेशों का फरमान जारी होता है!

उस परिवार को,
गन्ना ना देकर,
भेली दी जाती है,
मुझे अपने बुजूर्गों की बात याद आती है!

यदि सरकारें, संवेदनशील हो जाएं,
हर खाली हाथ को काम दे पाएं,
तो परिवार के सामने,
यह समस्या ही खड़ी ना हो पाए,
क्या खाएं, कहां से लाएं,
कैसे परिवार का जीवन बचाएं,
हर किसी को भरोसा रहेगा,
वह भूखा उठेगा तो सही,
किन्तु भूखा सोएगा नहीं!!

वह सिर्फ गन्ना दे दें,
भेली तो हम स्वयं ही बना देवें!

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