कविता · Reading time: 1 minute

गति

समझौते
बन गए हैं
जिन्दगी के पर्याय मेरे

अंधकार टूटन बिखराव
चिर सहयोगी हैं
अंत हीन बेतरतीब सफर के

मेरी आस्था श्रद्धा
मेरा दृढ़ विश्वास
बंद है मेरी मुट्ठियों में
मरु सागर का भ्रम देते हैं
मै अनंत की तलाश मे हूं

मेरे साथी
मेरी थकान को गति दो

लेखक संतोष श्रीवास्तव

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