.
Skip to content

गतिमान रहो

श्रीकृष्ण शुक्ल

श्रीकृष्ण शुक्ल

कविता

May 20, 2017

दो पल का ये नश्वर जीवन
हर पल इसको भरपूर जियो
तुम किस उलझन में ठहरे हो
गतिमान रहो, गतिमान रहो

रवि में गति है, शशि में गति है
पृथ्वी में गति, उड्गन में है
ध्वनि के संचालन में गति है
इन सूर्य रश्मियां में गति है
इस दिव्य जगत के कण कण में
गति ही सदैव परिलक्षित हो
तुम किस उलझन में ठहरे हो
गतिमान रहो, गतिमान रहो

गति जीवन में गति श्वासों में
गति हिरदय के स्पंदन में
गति रक्त शिराओं में भी है,
गति नाद स्वरों के गुंजन में
गतिहीन नहीं कुछ जीवन में,
गति है तो हैं ये प्राण अहो
तुम किस उलझन में ठहरे हो
गतिमान रहो गतिमान रहो.

श्रीकृष्ण शुक्ल, मुरादाबाद

Author
श्रीकृष्ण शुक्ल
सहजयोग, प्रचार, स्वांतःसुखाय लेखक, कवि एवं विश्लेषक.
Recommended Posts
*हंसते रहो हंसाते रहो,गीत ख़ुशी के गाते रहो *
Neelam Ji गीत Jun 14, 2017
हंसते रहो हंसाते रहो ... गीत ख़ुशी के गाते रहो ... सुख दुःख आने जाने हैं । जीने के ये बहाने हैं ।। हर गम... Read more
कविता
दीप तुम जलते रहो,अंधकार हरते रहो। नव उल्लास के साथ नई राह चलते रहो।। मंजिले करीब है दुश्मनों से लड़ते चलो। काम क्रोध लोभ मोह... Read more
हसरतें
हसरतें दिल में लिए न खामोश रहो तुम कह भी दो अधरों से न रहो खुद में गुम मौसम तो यूंही पल-पल बदलते रहेंगे मगर... Read more
गजल बन रहो
आरजू है यही तुम गजल बन रहो। चाँदनी रात में इक कँवल बन रहो।। चाँदनी पूर्णिमा की गगन में खिले। जिंदगी में सदा तुम धवल... Read more