कविता · Reading time: 1 minute

गणित और मेरी वार्तलाप

हे गणित तू फिर आ गयी ।
काली घटा बन कर मुदित मन को आह्लादित करने।।
परन्तु कोई बात नहीं आ ही गयी है तो मित्रवत ही रहना।
था बचपन से अपन दोनों का एक दूसरे को मुश्किल सहना।।
अब तो मेरे उम्र का लिहाज कर।
शिक्षक हूँ मैं आज अब तो कुछ समझा कर।।
मत ला वो बड़े-बड़े सवालों का महासागर ।
करने में पार आती थी जिसमें समस्याएं अपरम्पार ।।
ऐ गणित अब कितना रुलाएगी।
क्या होगा ऐसा कोई दिन जब तूँ समझ आ जाएगी ।।
अभी भी त्रिभुज के सर्वांगसम होने का भय बड़ा सताता है।

ले यह जान और जान के खुश हो जा।
मुँह मोड़ ले या प्रेयसी बन जा।।
क्यों एक भयकारी पत्नी सम प्रतीत होती है।
चाहता हूँ मनाता हूँ फिर भी रुठती ही जाती है।।
कहता हूँ खाकर कसम आज ।
चढ़कर तेरे उन्नयन कोण पर
अवनमन की भांति लगा दूँगा छलांग आज।।हेलो

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कविताएं मेरी प्रेरणा हैं साथ ही मैं इन्टरनेशनल स्कूल अाॅफ दुमका ,शाखा -_सरैयाहाट में अध्यापन करता हूँ जो कि एक निजी विद्यालय है।
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