गणतंत्र

*गणतंत्र*
रात गुजारीं जागे जागे,
दिवस हजारों खोए हैं।
आजादी की वरमाला में,
मुण्ड हजार पिरोए हैं।

चिंगारी से सोले तक की,
शूलों वाली राह चुनी।
छोड़ भीरुता की उँगली को,
संकल्पों की बाँह चुनी।
लक्ष्य एक गणतंत्र मिले,
गम के पर्वत तक ढोए हैं।

जाति धर्म मजहब से ऊपर,
जन- जन इसका जीवन है।
समता की ताकत से अपनी,
गेह गेह चंदन वन है।
जन गण मन ने सालों तपकर,
मल कटुता के धोए हैं।

तंत्र अखण्डित महिमा मण्डित,
विश्व शक्ति बनकर उभरें।
अमर समर्पित होकर हम,
आओ निज गणतंत्र करें।
स्वस्थ राज्य के कारण हम,
अंकुर स्नेह के बोए हैं।

अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ, सबलगढ़, मुरैना(म.प्र.)

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