गज़ल

” ज़िंदगी से दर्द पाने का भी अपना ही मज़ा है,
चोट खाकर मुस्कराने का भी अपना ही मज़ा है,

कौन कहता, है ज़रूरी जंग जीती जायें सब
प्यार में तो हार जाने का भी अपना ही मज़ा है,

ख़ुशगुवारी में गज़ल गाना कोई हैरत नहीं,
दर्दे दिल में गुनगुनाने का भी अपना ही मज़ा है,

नफ़रतो की तीरगी से किसको क्या हासिल हुआ,
प्यार के दीपक जलाने का भी अपना ही मज़ा है,

बँट गये इंसान मज़हब में अगर तो क्या हुआ?
‘ज्योति’ सबसे दिल मिलाने का भी अपना ही मज़ा है “

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