गज़ल

मेरे रहबर, मेरे मेहरम, सनम मुझ पर अहसान करो,
मैं तूफानों का पाला हूँ, न मंजिल तुम आसान करो।
जमीं हूँ मैं मुहब्बत की, न जलती हूँ न बुझती हूँ,
गिराओ तुम तो बस बिजली, मेरा तुम एहतराम करो।
अंगारे है धरे अधरों पर, पैरों में है बस छाले,
हटा लो तुम भी फूलों को, खड़ी कोई चट्टान करो।
मीलों तक है बस मारू, बिछी है सूनी तन्हाई,
जलाओ तुम भी सूरज को, खुदा नाज़िल इल्जाम करो।
तेरा दिल हमने तोड़ा है, किया घायल हरेक सपना,
लगा दो तुम भी हर तोहमत, हर एक गलती मेरे नाम करो।

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हम फकीरों का बस इतना सा फ़साना है, न अम्बर मिला न ज़मीं पे आशियाना...
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