गजल

राम नामी ओढ़ कर, मैं ठग रहा होता जगत को,
किन्तु मानव धर्म से ही, हारता हरदम रहा बस l
चाहता तो यह सफर मैं, पार कर लेता मजे से,
गैर की ही रहनुमाई, ढूढ़ता हरदम रहा बस l
मन्च के सम्मान सब मैं, प्राप्त कर लेता सहज ही,
चाटुकारों से हमारा, फासला हरदम रहा बस l
लूटता मैं आबरू, झूठे दिलासों के सहारे,
किन्तु जो अन्तस् में बैठा, रोकता हरदम रहा बस l
आतंक का साया बना कर, चाहता यश कीर्ति पाना,
भाई चारा प्रेम ही, पुचकारता हरदम रहा बस l
स्वार्थ का सम्बल लिये मैं, पहुँच जाता बहुत ऊपर,
स्वाभिमानी मन मेरा, धिक्कारता हरदम रहा बस l
जो लुभाये मन्च को, सच वह कला मैं जानता था,
किन्तु अन्तरद्वन्द ही, दुतकारता हरदम रहा बस l
झूठ के पेबन्द से, सच को छिपाना चाहता था,
किन्तु अन्तर्मन मेरा, झकझोरता हरदम रहा बस l

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