गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

न जाने कब तेरे…

न जाने कब तेरे जलवों में रवानी आयी,
न जाने कब तेरी सैलाब पर जवानी आयी,

हमें तो होश ही कब था तेरे होंठों से पीने का बाद,
न जाने कब हमारी सुधियों में वो कहानी आयी|

कभी तो शाहजहां – मुमताज के किस्से सुना करते,
न जाने कब मुझे भी याद वो राजा की रानी आयी,

कभी सबकुछ लुटा डाला था हमने इश्क में तेरे,
न जाने कब लुटा दी आज वो निशानी आयी|

न वो सदियां पुरानी हैं न वो यौवन पुराना है,
न जाने कब क्यों धोखे से वो बात पुरानी आयी |

– पुष्पराज यादव
09760557187

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