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गजल

Neelam Naveen

Neelam Naveen "Neel"

गज़ल/गीतिका

May 11, 2017

नुमू  की हसरतों में  दिल औ दरख्त खुलता गया
कब मंजिलें  मेरे करीब आयी  पता ही न चला ।

वो सब्ज़बख़्त कह कर  उम्रभर सँवारते रहे हमको
कब हथेलियो से रेखाएँ गिर गयी पता ही न चला ।

कई अर्से गुजरे फिर कहीं उनसे वस्ल के मंजर बने
शाम कयामत बन बन कर आयी पता ही न चला ।

लज्जत लिऐ वो कई दफा मिरे दिल की दुकानों से
आहिस्ता आहिस्ता फना हो गयी  पता ही न चला ।

उदू कई है  मेरे भी अजीज दोस्तों की महफिल में
बातों बातों में कब यारी बदल गयी पता ही न चला ।

लबों से तबस्सुम लेकर वो करीब से गुजरते गये
नाजनीन सी पलकें कब नम हुयी पता ही न चला ।

मग्लूब में गिरे भी कई कई दफा जिन्दगी की खातिर
कब उसमें सिमट कर “नील” खो गयी  पता ही न चला ।

नीलम पांडेय “नील”
8/4/17

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Author
Neelam Naveen
शिक्षा : पोस्ट ग्रेजूऐट अंग्रेजी साहित्य तथा सोसियल वर्क में । कृति: सांझा संकलन (काव्य रचनाएँ ),अखंड भारत पत्रिका (काव्य रचनाएँ एवं लेख ) तथा अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । स्थान : अल्मोडा

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