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गजल-2

रजनी मलिक

रजनी मलिक

गज़ल/गीतिका

September 27, 2016

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बेखुदी में गुनगुनाना चाहिये।
वक़्त से लम्हा चुराना चाहिये।
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जो इशारों में सदा जाहिर हुए
आज लफ्जों को ठिकाना चाहिये।
””””””””””””'”””
क्यूं दी मेहरबानियाँ तुमने मुझे ,
हक मुझे ये आजमाना चाहिये।
“””””””‘””””””
रात दिन रहती थी रौनक मेरे घर,
अब उसे भी इक बहाना चाहिये।
“”””””””””””””’
साथ खुदगर्जी नहीं रखना कभी,
गर तुम्हें अपना जमाना चाहिये।
“”””””””””””””””
भूख अब इंसा निगलती जा रही,
जिंदगी को शामियाना चाहिये।
“”””””””””””””
खेत,बगिया,लहलहाते बस वहीँ,
बारिशों को गावं जाना चाहिये।

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Author
रजनी मलिक
योग्यता-M.sc (maths) संगीत;लेखन, साहित्य में विशेष रूचि "मुझे उन शब्दों की तलाश है;जो सिर्फ मेरे हो।"
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