कविता : सीखा हमने

मौसम की तरह बदलना नहीं सीखा हमने।
सबसे गले मिलते हैं जलना नहीं सीखा हमने।।

सफलता पर दुश्मन को भी दाद दी ख़ुशी से।
मुँह फेर बगल से निकलना नहीं सीखा हमने।।

कोई माँगे उसे नेक सलाह देते हैं सदा हम।
ग़ुमराह कर किसी को छलना नहीं सीखा हमने।।

दिल में अपनत्व का दरिया बहता जाने क्यों?
किसी की ख़ुशी से हाथ मलना नहीं सीखा हमने।।

वो आते हैं हमारी तरफ़ चाहत में खिंचे-खिंचे।
आदमी देखकर तेवर बदलना नहीं सीखा हमने।

सच की तारीफ़ करूँ,झूठ की करता हूँ निंदा मैं।
आत्मा की आवाज़ से बचना नहीं सीखा हमने।।

अहं वो आग है जो जलाकर निशां भी न छोड़े।
ऐसी आग में कभी उबलना नहीं सीखा हमने।।

आदमी आदमी को देख जलता है यहाँ,दोस्तो!
हम देख खिलते हैं मुर्झाना नहीं सीखा हमने।।

कभी एक काम भलाई का भी कर चलें हम।
हरपल बुराई से ही उलझना नहीं सीखा हमने।।

“प्रीतम”हो सके तो किसी का दिल न दुखाना।
ग़रीब की एक हाय!से उभरना नहीं सीखा हमने।।

राधेयश्याम बंगालिया”प्रीतम”
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