गजल जिंदगी ख़ाक में मेरी

जिंदगी ख़ाक में मेरी ये रकीब मिलाने लगे है
सफर आखिरी है दूल्हे सा मुझे सजाने लगे है

मायूसियों के जज्बात तरसता दिल ले चला हूँ
सज़ा मुझे मौत की यारो अब सब सुनाने लगे है

उसकी सिसकती पुरानी यादों को ले कर चला हूँ
यादो के लश्कर का कारवां अब सब उठाने लगे है

जिन हांथो से बनाया था कभी आशियाना उसका
उन हाथो पर रेत अब दुश्मन मुझपर बरसाने लगे है

उसको मुझसे कोई जुदा ना करो इश्क मेरा खुदा है
उसको अपना खुदा बनाने में मुझको जमाने लगे है

अशोक तेरी आखिरी आरजू भी रही दिल में दफन
रेत के दरिया में ज़मीर तेरा ,वो भी दफनाने लगे है

अशोक सपड़ा की कलम से दिल्ली से

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