May 15, 2021 · कविता
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गंगा में बहकर आयी है लाश

देखा था जानवरों की मृत देह को सड़ते हुए
सफेद गिड़ाडों को शव निगलते हुए
चील-कौओं-कुत्तों को शव नोचते हुए
नदी-नालों में अनाथ असभ्य मरे जीवों को बहते हुए…

आज सड़ रहा है इंसान
बदबू फैल रही है सिंहासन तक
नाक-मुँह सिकोड़े इंसानियत सँभल रही है
किसी का हाथ किसी की आंख चील-कुत्तों का पेट भर रही..

पानी में बहकर आयी है लाश
आंखों का पानी सुखाकर आयी है लाश
कोई अपना था जिसके अपने बचे हैं
उनकी मजबूरी पर तरस खाकर आयी है लाश ….

अब जलाओ या दफ़नाओ
इंसान भी सड़ते है, यही बताने आयी है लाश
मुर्दाखोरों का पेट भरकर
स्वर्ग-नर्क का फर्क जानने गंगा में बहकर आयी है लाश ..

इंसान कुछ नाक-मुँह सिकोड़कर देख रहे है
इंसान कुछ जबरन लाश बनकर सड़ रहे है
इंसान कुछ सबकुछ दबाने फाइलों में गड्डा खोद रहे हैं
इंसानी सभ्य समाज की सभ्यता दिखाने आयी लाश..

सफेदपोश बैठे हैं सजकर मंच पर
फाइलों में दिखाने इंसानियत के आंकड़े
ना कोई भाई ना बहिन ना माँ ना बाप या पति
वस गिनती गिनाने, बहकर आयी है लाश ।

कुत्ते के मुँह में माँस देखकर
शव को नोचते गिद्दों को देखकर
बिखडी पड़ी अंतड़िया देखकर
बताओ वो हिन्दू है या मुसलमान या जानवर
यही पूछने नदी-नाले में बहकर आयी है लाश…….।।

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सोलंकी प्रशांत
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Working as Govt. Pharmacist In Delhi. मैं कुछ नही, सिवाय चलती-रूकती आत्मा के । इस... View full profile
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