कविता · Reading time: 1 minute

गंगा मां

ब्रह्म कमंडलु, विष्णु पदों से
शंकर जटा समायी,
भागीरथ तप बल से हर्षित
पृथ्वी पर चलि आई ।
सगर सुतों की तारनहारिणि,
शुचि सुतरंगिणि गंगे मां ।।
नमो-नमो मां त्रिपथगामिनी,
पतित पावनी गंगे मां ।

हिमनद गंगोत्री से उद्भव
भरतभूमि में छाई,
निज निर्मल पियूष से सारी
धरणी तृप्त कराई ।
जलचर, थलचर, नभचर सब हित,
सुधा प्रवाहिनि गंगे मां ।
अखिल जगत की पातक नाशिनि
पुण्य दायिनी गंगे मां ।।

अगणित शिष्ट जनों ने तेरे-
तट पर ध्यान लगाया,
शांत चित्त तपबल से अपने
नव-इतिहास रचाया ।
कल-कल छल-छल निर्मल स्वर-
वात्सल्य प्रदायिनी गंगे मां,
देव उपासित, वेद-वंदिता
मोक्ष दायिनी गंगे मां ।।

– नवीन जोशी ‘नवल’
बुराड़ी, दिल्ली

CRR

2 Likes · 4 Comments · 56 Views
Like
You may also like:
Loading...